मेरे पापा कहते है, की दुःख तो जीवन का हिस्सा है। लेकिन मेरी जिदंगी मे ऐसा नही था। मेरे तो दुःख का कारण ही मेरे अपने थे। जिदंगी ने छोटी सी उम्र मे बहुत कुछ सीखा दिया। सोचती भी हुँ, तो रुह कांप जाती है। सब कुछ बहुत सही था, लेकिन अचानक उसमें बदलाव आने लगे, वो रुखा रुखा सा रहने लगा मैंने कोशिश की जानने की लेकिन धीरे-धीरे समझ आने लगा, कि वो मुझसे दुर जा रहा है। मैंने बहुत कोशिश की उससे बात करने की लेकिन मैं समझ नही पाई की वह तो मन बना चुका था, मुझसे दुर जाने का। मैं कोशिशे करती रही, खुद का अस्तित्व ही भूल गई। हर कोशिश की मैंने उसे समझने और समझाने की लेकिन उसने मेरी एक ना सुनी, मैं उसके सामने रोती रही, उससे भीख मांगती रही, की वह मेरे साथ रहे, मुझसे दुर ना जाऐ। लेकिन वह चला गया मुझे रोता हुआ छोङ गया। सब थे, मेरे साथ फिर भी कुछ था, जो अधूरा था। उसकी कमी ने मुझे खोखला कर दिया।

अपने आप को बहुत तसल्ली दी, बहुत समझाया लेकिन मैं उसे नही भुल पाई। मैं ऐसा नही कह सकती की वो समय मेरा सबसे बुरा समय था, क्युंकी आज भी मैं उसका इंतजार कर रही हु, कि वह जरुर आएगा, आज भी में उसकी याद मे रोती हुँ। आज भी मुझे उसकी कमी खलती है, आज भी मुझे मेरी उससे पहली मुलाकात याद है।

मेरे पापा और मेरी माँ मुझे हमेशा समझाते है, कि मैं उसका इंतजार करना छोङ दुँ। लेकिन मैं अपने आप को केसे विश्वास दिलाऊ। मुझे विश्वास हे, की वह वापस मेरे पास जरुर आएगा। मैं हमेशा उसका इंतजार करती रहुंगी।

लेकिन आज तक मुझे यह सवाल हमेशा परेशान करता है, कि उसने ऐसा क्यू किया, क्या कमी रह गई थी, मेरे प्यार में?